क्योंकि उन्हें अच्छी तरह यक़ीन है कि ईरान के सहयोग के बग़ैर बहुत से मुद्दों को हल कर पाना असंभव है।
अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान के बारे में वार्ता के लिए ईरान को दो बार संदेश भेजा। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली शमख़ानी ने तेहरान में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बताया कि अमरीकी अधिकारियों ने मुझे दो बार संदेश भेजा कि वह अफ़ग़ानिस्तान के बारे में ईरान से वार्ता करना चाहते हैं।
सवाल यह है कि अफ़ग़ानिस्तान के बारे में अमरीका ईरान से क्या वार्ता करना चाहता है? यह तो सब को पता है कि अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा या आर्थिक विकास सहित किसी भी क्षेत्र से अमरीका को कोई रुचि नहीं है वह अफ़ग़ानिस्तान को अपने ठिकाने के रूप में प्रयोग करने की कोशिश में था मगर इस कोशिश में अमरीका को भारी नुक़सान उठाना पड़ गया। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका के 2 ट्रिलियन डालर ख़र्च हो गए जबकि अमरीका को इसके बदले कुछ भी हासिल नहीं हुआ। अमरीकी अधिकारियों को यह विश्वास हो चला है कि यदि वह आगे भी कई साल तक अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों को रोके रखते हैं तब भी उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है, इस स्थिति में यदि बातचीत के माध्यम से अमरीकी हितों की रक्षा के लिए कोई रास्ता निकल सकता है तो उसे ज़रूर आज़माना चाहिए।
ईरान से वार्ता अमरीका को इसलिए भी ज़रूरी महसूस हो रही है कि वाशिंग्टन ने सीरिया और इराक़ के मामलों में अच्छी तरह देख लिया है कि हालात को कंट्रोल करने और परिस्थितियों का रुख़ मोड़ने में ईरान की कितनी निर्णायक भूमिका रही।
इराक़ और सीरिया दोनों ही मामलों में अमरीकी एलायंस की रणनीति पूरी तरह फ़ेल हुई जबकि ईरान और उसके घटकों की रणनीति सफल उदाहरण बन गई। इराक़ और सीरिया के मामलों में ईरान विरोधी मोर्चे का हिस्सा होने के नतीजे में अमरीका बिल्कुल ख़ाली हाथ रह गया अतः अमरीका इस समय सीरिया से अपने सैनिक निकालने पर मजबूर है जबकि इराक़ में तैनात अपने 5000 से कुछ अधिक सैनिकों को भी उसे बाहर निकालना पड़ेगा क्योंकि इराक़ के भीतर अमरीकी सैनिकों की मौजूदगी के ख़िलाफ़ प्रबल रूप से आवाज़ें उठने लगी हैं।
अमरीका को इस बात से भी गहरी चिंता है कि रूस ने ईरान के संबंध में अलग रणनीति अपनाई और काफ़ी फ़ायदे में रहा। स्थिति यह हो गई है कि जहां पश्चिमी एशिया के इलाक़े से अमरीका के पांव उखड़ रहे हैं वहीं इस इलाक़े के देशों के साथ रूस के स्ट्रैटेजिक संबंध स्थापित हो रहे हैं।
वाशिंग्टन की कोशिश है कि कम से कम अफ़ग़ानिस्तान के मामले में सीरिया और इराक़ वाला अनुभव न दोहराया जाए। अमरीका की इस चिंता का कारण यह है कि तालेबान ने यह बात स्पष्ट रूप से कह दी है कि अमरीका को अपने सारे सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकालने होंगे और वे अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति को सहन नहीं कर सकते।
अब सवाल यह है कि क्या ईरान अमरीका से वार्ता करेगा? इस सवाल के उत्तर में यह देखना ज़रूरी है कि ईरान और अमरीका के बीच अब तक हुई वार्ताओं का अंजाम क्या हुआ है? क्या वार्ता सफल हुई है और क्या वार्ता के अंजाम से ईरान संतुष्ट है? साफ़ ज़ाहिर है कि ईरान और अमरीका के बीच विश्वास की भारी कमी है। ईरान अमरीका को भरोसे के लायक़ नहीं समझता और ईरान की इस सोच के ठोस कारण हैं।
अमरीका ने परमाणु समझौते के बारे में जो रवैया अपनाया है और जिस तरह इस अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज़ को पूरी तरह दरकिनार कर दिया उसे देखते हुए ईरान क्या ख़ुद अमरीका के क़रीबी घटक भी उस पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं हैं।